सम्बल ( सहारा )
मंजिलें आसान हो जाती थी ,
पिता के मजबूत हाथों का सम्बल पाकर |
आकाश की ऊँचाई नापने की ,
सागर की गहराई जाँचने की ,
प्रगतिपथ पर बिन रुके हरपल आगे बढ़ते रहने की ,
कोमल हृदय में उस बालक के ,
जब - जब ये इच्छा घर करती थी ......
अधरों पर विजयी मुस्कान पाकर ......
मंजिलें आसान हो जाती थी ,
पिता के मजबूत हाथों का सम्बल पाकर |
तपता दिन और काली अँधेरी रातों में ,
डूबते सूरज का कमज़ोर ख्याल आते ही ,
कुंठित मन और क्षीण बुद्धि की जकड़न में ,
घबराई साँसों के एक - एक कर रुकते ही ,
कठिन और थमे से इन पलों में ......
आस - विश्वास भरी निगाह पाकर ......
मंजिले आसान हो जाती थी ,
पिता के मजबूत हाथों का सम्बल पाकर |
अदभुत आशाओं के जगते ही ,
मजबूत - विशाल इरादे बनते ही ,
उत्सुक मन से आगे बढ़ते ही ,
लक्ष्य प्राप्ति की आस बँधते ही ,
चुनौतियों को जैसे पार करते ही ......
पीठ थपथपाते उन हाथों का स्पर्श पाकर ......
मंजिलें आसान हो जाती थी ,
पिता के मजबूत हाथों का सम्बल पाकर |
मधु धीमान