Thursday, November 21, 2019

#ShortStory: सासू माँँ की सीख !

वाह ! कितना सुंदर था वह समय, कितने सुंदर थे वे रिश्ते ।
मेघा की शादी हुए अभी तीन ही दिन हुए थे | कुछ रिश्तेदार अभी भी रुके हुए थे । चौका चढ़ाने की रस्म भी आ गई , और सासू माँ ने मेघा को हलवा बनाने के लिए रसोई में बुलाया । माँँ ने उसे हलवा बनाना खूब अच्छी तरह से सीखा रखा था और रसोई के काम करने का शौक भी खूब था । फिर भी कोई गलती ना हो जाए, बार -बार मेघा भगवान से यही प्रार्थना कर रही थी ।

बहुत ध्यान से और दिल लगाकर उसने हलवा बनाया । सबको हलवा खूब पसंद आया । सब ने दिल खोलकर प्रशंसा की । सासू माँँ भी फूली नहीं समा रही थी कि मेरी नई नवेली दुल्हन काम करने में इतनी निपुण है । सबने शगुन के तौर पर मेघा को मुँँह माँँगे तोहफे दिए और वो भी बहुत खुश थी कि चलो बिना किसी गलती के  इतना स्वादिष्ट हलवा बना और खूब प्रशंसा भी हुई ।

सब मेहमानों के जाने के बाद सासू माँँ ने मेघा को अपने पास बुलाया और प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए बोली; तुम तो बहुत अच्छा हलवा बना लेती हो, पर मेरी एक बात हमेशा याद रखना कि जब भी रसोई में काम करो तो कभी भी तुम्हारे बर्तनों की आवाज तुम्हारी रसोई से बाहर ना आए। जिस दिन यह बात एक औरत को समझ आ जाती है ना तो कभी घर की किसी कमी का ढिंढोरा और न ही घर की कोई चर्चा घर से बाहर जाती है।
अपनी सासू माँँ की सिखाई इस बात को मेघा ने जिंदगी भर के लिए गाँठ बाँध लिया! 

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#Story; मेरी ख्वाहिशें अभी जिंदा है !

नितिका को बचपन से ही ड्राइंग करने का बहुत शौक रहा है | बड़े होते - होते यह ड्राइंग खूबसूरत पेंटिंग में बदल गई | नीतिका ने एक से बढ़कर एक खूबसूरत पेंटिंग बनाई | कोई भी वह अद्भुत कलाकारी देखता तो तारीफ किए बिना नहीं रह पाता |  शादी के बाद भी नितिका ने अपना यह शौक बरकरार रखा | ससुराल में सभी लोग उसकी इस कला के दीवाने हो गए थे| उसने अनेकों खूबसूरत पेंटिंग्स बनाई और अपने सभी प्रिय रिश्तेदारों को उपहार स्वरूप सप्रेम भेंट की | जब भी कोई उसकी बनाई किसी कृति की तारीफ़ करता तो और उम्दा कृति बनाने के लिए उसका उत्साह बढ़ जाता और वह अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाने का सपना देखने लगती।  अब नितिका दो बच्चों की माँ बन चुकी थी । बड़ी बिटिया दसवीं कक्षा में थी। इस ज़िम्मेदारी भरी जीवन यात्रा में उसका चित्र बनाने का यह शौक दूसरे - तीसरे पायदान पर पहुँच गया था ।
एक दिन यूँहि उसके पतिदेव पूछ बैठे - नितिका , तुमने काफी समय से कोई पेंटिंग नहीं बनाई ।
सुनते ही उसने नज़र उठाई और बोली हां …...जैसे (वह तो भूल ही गई थी कि कभी पेंटिंग बनाना उसका सबसे पहला शौक था )
मैं कल एक चित्र प्रदर्शनी में गया था - पतिदेव बोले ।
मुझे क्यों नहीं ले कर गए - वह काम करते-करते उत्सुकता वश अपने दोनों हाथ खाली करते हुए बोली ।  अभी तो प्रदर्शनी 1 सप्ताह के लिए है । हम एक बार फिर चलेंगे - वह नीतिका की उत्सुकता देख उसे दिलासा देते हुए बोले ।
रात भर नितिका सोचती रही- काफी समय से उसने कोई नई पेंटिंग क्यों नहीं बनाई, वह अब जरूर नई कृति बनाएगी । अगर वह लगातार नई पेंटिंग्स बनाती रहती तो शायद उसका चित्र प्रदर्शनी लगाने का सपना पूरा हो जाता । अगले दिन जैसे ही वे दोनों चित्र प्रदर्शनी पहुँचे तो वहाँ एक से बढ़कर एक कृति देख नितिका की तो आँखें चुँधिया गई । उसका बेजान हुआ उत्साह फिर से जाग गया । पतिदेव के एक मित्र भी यही शौक रखते थे , वे भी प्रदर्शनी देखने पहुँचे हुए थे । जैसे ही उनका आमना-सामना हुआ
तो पतिदेव नीतिका की तारीफ़ में बोल पड़े - यार , नितिका भी बहुत सुंदर पेंटिंग्स बनाती है ,अभी एक नई पेंटिंग शुरू करने की सोच रही है, यह भी चित्र प्रदर्शनी लगाना चाहती है ।
इस पर वह महाशय पतिदेव की बात बीच में ही काटते हुए बोले - भाभी जी ,अब तो बच्चे बड़े हो गए हैं । हमें अपने शौकों की न सोचते हुए बच्चों की रुचियों की ओर ध्यान देना चाहिए । हमारा समय तो अब निकल गया । अब तो बच्चों की इच्छाओं को रास्ता देना है । अपनी तरफ से वह समझदारी भरी बातें कर रहे थे , परंतु नीतिका को उनकी बात सही नहीं लगी और वह बीच में ही बोल पड़ी - भाई साहब, बच्चों का अपना जीवन है ,और हमारा अपना ।
हमारा जीवन अभी बाकी है। हमें बच्चों के शौक पूरे करने में सहयोगी बनना है ना कि अपनी सभी ख्वाहिशें त्याग कर उनका साथ देना है। मैं तो जीवन के अंतिम क्षण तक सीखने की इच्छा रखती हूँ और सीखती भी रहूँगी । जल्द ही आप मेरी भी चित्र प्रदर्शनी देखने आएँगे ।
 यह सुनते ही मित्र महाशय के मुँह पर तो जैसे ताला ही लग गया ।
नीतिका ने पतिदेव का हाथ पकड़कर कहा - चलें क्या, पेंटिंग का सामान भी तो खरीदना है ।
पति देव नितिका के आत्मविश्वास को देख मंद - मंद मुस्कुरा रहे थे । जब तक हम अपने पंख फैलाए रखेंगे , कोई हमारा उड़ना बंद नहीं करवा सकता । मधु धीमान

कैथल (हरियाणा)

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#Article; सादा जीवन-उच्च विचार !

आज के युग में ' सादा जीवन - उच्च विचार ' यह केवल सुनने मात्र के लिए ही रह गया है , परंतु आज हम सब ने अपने खर्चे अत्यधिक बढ़ा लिए हैं , लग्जरी बढ़ा ली है , विलासिता बढ़ा ली है । औसत से अधिक खर्च करना हमारी आदत हो गई है ।
'सादा जीवन - उच्च विचार ' यह पूर्णतया सत्य है क्योंकि यदि आपका जीवन सादा है तो आपके विचार भी उच्च होंगे और यदि आपका रुझान लोक दिखावे या प्रचलित फैशनों की ओर है तो आपके विचार कभी भी उच्च नहीं हो सकते। आपको पता ही नहीं चलेगा कि कब विलासिता ,अहंकार और वासना आप में घर कर लेंगे और धीरे-धीरे आपका अस्तित्व नीचे की ओर गिरना शुरू कर देगा ।
'सादा जीवन - उच्च विचार' का एक ज्वलंत उदाहरण डॉ. ए.
पी.जे. अब्दुल कलाम जी हैं । उनका जन्म एक गरीब और अल्प शिक्षित परिवार में हुआ । छोटी उम्र में ही उन्होंने काम में पिता का हाथ बँटाना शुरू कर दिया था । स्कूली शिक्षा में वह एक औसत दर्जे के विद्यार्थी थे परंतु अपने सादे जीवन , उच्च विचारों और मेहनती स्वभाव के कारण वह राष्ट्रपति पद तक अपनी पहुँच बनाने में कामयाब हुए ।
अर्थात हमें सुखमय जीवन जीने के लिए सादा जीवन जीने का आदि होना चाहिए । यद्यपि हमारी सोच सीमित नहीं होनी चाहिए अपितु हमें आसपास के सकारात्मक बदलावों के बारे में भी सोचना चाहिए । हमारा जीवन जीने का ढंग साधारण होना चाहिए परंतु हमारी सोच और विचार बड़े होने चाहिए । जो लोग बड़ा नहीं सोच सकते , वे व्यापक मानसिकता का विकास नहीं कर सकते । उनकी सोच सीमित हो जाती है ।
सादा जीवन जीने से हमारे जीवन में बहुत बदलाव आ सकते हैं, जैसे -
हम परिवार के करीब आते हैं ।
हमारा तनाव निम्नस्तरीय हो जाता है।
हमें स्वयं पर नियंत्रण करना आता है ।
परिस्थितियाँ काबू में रहती हैं ।
हमें अपने लिए जीना चाहिए ना कि दूसरों को प्रभावित करने के लिए । हमें समझना चाहिए कि खुशी केवल अपने भीतर मिल सकती है । अगर हम सादा जीवन - उच्च विचार रखते हैं तो हम आंतरिक खुशी और शांति प्राप्त कर सकते हैं ,जो हमें समाज में अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करती है ।
मधु धीमान

कैथल( हरियाणा )

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आज की आवश्यकता: संस्कार

जिस प्रकार एक कुम्हार मिट्टी को कोई भी रूप दे सकता है , ठीक उसी प्रकार हम भी बच्चों को किसी भी रूप में
ढाल सकते हैं बशर्ते हमें और आज के बच्चों को नियम बद्धत्ता की आवश्यकता है । केवल मनुष्य ऐसा प्राणी है जिसके भीतर रावण बनने की भी संभावना है और राम बनने के अवसर भी । मनुष्य में यदि डाकू बनने की संभावना है तो उसके भीतर महात्मा बुद्ध बनने का अवसर भी है परंतु यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज हमें जगह-जगह इंसानियत को आतंकित करने वाले रावण या डाकू तो मिल जाएँगे परंतु राम , कृष्ण और बुद्ध कहीं नजर नहीं आते । जिस प्रकार इत्र की खुशबू चारों और बिखर जाती है और हर वस्तु को सुगंधित कर देती है ठीक उसी प्रकार हमें आज के बालक के लिए भी ऐसी संभावनाएँ तय करनी है कि वह सुगंधित फूल की तरह खिल सके । उसे संस्कारवान बनाने के लिए कुछ मुख्य बिंदु अहम भूमिका निभाते हैं जैसे - 1 वातावरण का प्रभाव - वातावरण एक बालक को अत्यधिक प्रभावित करता है । बालक के चारों तरफ सहजता , सकारात्मकता , सहयोग और उत्थान के पथ होना आवश्यक है । ध्यान रहे कि प्रत्येक बालक में अद्भुत व विलक्षण क्षमता है यदि हम उस अद्भुत - विलक्षण क्षमता को विशिष्टता में बदलना चाहते हैं तो बालक के चारों ओर सकारात्मकता बनाए रखें । 2 संयुक्त परिवार : एक आवश्यकता - आज बालक के संस्कार - आदर्श कहीं लुप्त होते दिख रहे हैं । दुनिया में दूसरे नंबर की आबादी रखते हुए भी आज प्रत्येक व्यक्ति अकेला है । कुछ इस तरह का माहौल है कि केवल दो भाई बहन होने पर भी वे अकेले हैं क्योंकि सब अपने में व्यस्त हैं । परिवार टूटते जा रहे हैं । ऐसे में यदि संयुक्त परिवार बने रहें तो बालक अपने बड़ों - छोटो से जाने - अनजाने में संस्कार लेता रहता है । यदि समाज में बालक से योगदान की आशा है तो पहले उसे परिवार में योगदान करना सिखाने की आवश्यकता है । 3 समाज की दौड़ को सही दिशा - आज मनुष्य वैभव व अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की अंधी दौड़ में शामिल है । वह अपने मूल उद्देश्य को भूल गया है । आज बालक भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करके, दिखावा करके स्वयं को प्रसन्न महसूस करता है परंतु यदि मौलिक प्रसन्नता की कामना है तो बच्चों को वास्तविक जीवन जीना सिखाने की आवश्यकता है । 4 शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता - शिक्षा प्रणाली में भी अनुशासनहीनता दिखाई देने लगी है क्योंकि बालक को कुछ नहीं कहना -इस आड़ में संस्कारों का दहन और अनुशासनहीनता का जन्म हो रहा है । बालक को सही मार्ग - दिशा देना माता -पिता , गुरु का प्रथम कर्तव्य है। नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए बालक के उद्दंड स्वभाव पर रोक लगाना आवश्यक है । भावनाशील होकर संस्कृति के आधारभूत तत्वों को बालपन से ही बच्चों के व्यक्तित्व का अंग बनाने की आवश्यकता है । 5 तकनीकी का सकारात्मक रूप - तकनीकी के दिन - प्रतिदिन के विकास को देखते हुए हम विज्ञान के सामने नतमस्तक हैं और जहाँ एक ओर विज्ञान खुशहाली प्रदान करता है वहीं दूसरी ओर आतंकवाद का साधन भी है । जहाँ एक ओर वह घर आबाद कर सकता है वही दूसरी ओर युद्ध का तांडव भी इसका उदाहरण है, इसलिए बच्चों को तकनीकी के केवल सकारात्मक रूप से अवगत कराने की आवश्यकता है । ये बच्चे ही हमारी , समाज की व देश की वास्तविक संपत्ति है । इन बच्चों को संस्कारवान बनाना हमारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए । अपने व्यस्त जीवन में से कुछ लम्हें बच्चों के साथ बिताने की आवश्यकता है । यदि हम बच्चे का ,अपना ,समाज का व देश का भविष्य उज्जवल व सुरक्षित चाहते हैं तो हमें बच्चे के आज को कुछ समय देना पड़ेगा । तभी हम किसी राम ,कृष्ण या महात्मा बुद्ध की कल्पना कर सकेंगे । मधु धीमान

कैथल (हरियाणा)

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#Story; जीवन की मिठास!

रंजना की शादी को आज पूरा एक हफ्ता हो चुका था। शादी के तीसरे दिन से ही वह और उसके पति दोनों कहीं ना कहीं , किसी ना किसी रिश्तेदार के यहाँ खाने पर जा रहे थे । आज फिर उन्हें अपने ही शहर में अपनी चाची के घर जाना था। सही समय पर रंजना और पतिदेव दोनों तैयार हो गए और चल पड़े चाची के घर ।
 बातचीत करते-करते कब चाची का घर आ गया पता ही ना चला । चाची के घर में भव्य रुप से स्वागत किया गया दोनों का । चाची की बिटिया ने चाय बनाई और विभिन्न पकवानों से मेज़ सजा दी ।
तभी चाची जी बोल पड़ी - बहू ,यह गुलाब जामुन तो खाओ। रंजना ने भी हां-जी , अभी लेती हूं - कहकर गर्दन हिलाई ।
तभी दूसरे कमरे में बैठे चाचा जी बोले - बहू रानी को गुलाब जामुन खिलाए या नहीं ?
बीच - बीच में बातचीत का दौर चलता रहा ।कुछ ही देर में चाची जी का बेटा जोकि पढ़ने के लिए गया हुआ था , वापस आ गया था । आते ही बोला - भाभी जी ने गुलाब जामुन खाए या नहीं ?
अब रंजना के सब्र का बांध टूट चुका था । वह थोड़ा सा सकुचाते हुए चाची जी से बोली - चाची जी , क्या यह कोई स्पेशल गुलाब जामुन हैं ,सभी लोग गुलाब जामुन खिलाने की बात कर रहे हैं ।
चाची जी हँसते हुए बोली - बेटा , मुकेश ने हमें कल बताया था कि तुम्हें गुलाबजामुन बहुत पसंद हैं सो कल शाम तुम्हारे लिए यह गुलाब जामुन हम सब ने मिलकर बनाए हैं ।
अब रंजना को याद आ गया कि शादी के बाद वह जितने भी रिश्तेदारों के घर गई सब की मेज पर गुलाब जामुन की प्लेट सजी हुई थी ।
रंजना मुकेश की तरफ देख कर मुस्कुराने लगी , तब मुकेश ने झट से गुलाब जामुन की प्लेट उठाकर उसके सामने कर दी । रंजना बोली - अरे ,मेरे भोले पतिदेव, मुझे बेशक गुलाब जामुन बहुत पसंद है पर केवल एक या दो ही खा सकती हूँ मैं  ।
रिश्तों में इतनी मिठास, आपकी छोटी-छोटी पसंद , छोटी-छोटी खुशी का ध्यान रखा जाना - वाह ! कितना सुंदर प्यार है यह । यही सब छोटे -छोटे किस्से - कहानियाँ आपके जीवन में उमंग - उत्साह का नव संचार करते हैं । मधु धीमान

कैथल ( हरियाणा )

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#Story: अनमोल सीख !

निशा की शादी की तैयारियां खूब जोर शोर से हो रही थीं। जहां एक ओर निशा का मन शादी को लेकर प्रफुल्लित हो उठता था, वहीं दूसरी ओर एक नए परिवार में जाने के नाम से मन घबरा रहा था। सिर्फ कपिल को ही तो जानती थी वह और सब कैसे होंगे, कैसा होगा सबका स्वभाव यह सोचते ही वह डर सी जाती थी।
निशा माँ के साथ बैठी थी। मां कपड़ों की पैकिंग उठा उठाकर अटैची में लगा रही थी। जैसे ही निशा ने अपनी सास वाली साड़ी देखी तो एकदम माँ से पूछ बैठी- "माँ, मुझे डर लगता है, क्या ससुराल में सब के साथ मैं अच्छे से रह पाऊँगी?"
"ऐसा क्यों पूछ रही हो?"- माँ उसकी तरफ़ देखते हुए बोली।
"माँ, जैसे सब कहते हैं कि सास बहू की कभी नहीं बनती, पर मैं तो चाहती हूं कि मेरी सास और मेरी खूब बने" निशा जवाब में बोली।
माँ ने उसके दोनों हाथ अपने हाथ में ले लिए और बोली- "बेटा, प्यार और विश्वास से हर रिश्ता खूबसूरत बन जाता है। हमेशा जो मान-सम्मान और प्यार हम दूसरों से अपने लिए चाहते हैं, वही मान-सम्मान और प्यार हमें दूसरों को पहले देना पड़ता है।"
निशा के चेहरे पर अब मुस्कान आ गई थी।
माँ अपनी बात को पूरा करते हुए फिर बोली - "बेटा, तुमने कभी नोटिस किया है कि कहा जाता है जैसे- माँजी, आपका बेटा (अपने पति के बारे में सास से बात करते हुए) दीदी, आप के भैया (अपने पति के बारे में ननद से बात करते हुए) जैसे मैं भी जब पापा की बात करती हूं तो कहती हूँ 'तुम्हारे पापा' यानि यदि तुम 'मैं' और 'मेरा' की भावना न रखकर 'आप' 'आपका' 'तुम' 'तुम्हारा' का व्यवहार करोगी तो सब अपने आप तुम्हारे हो जाएँगे।
निशा की समझ में पूरी बात आ गई थी ।
निशा कपड़ों में से कपिल की ड्रैस की तरफ देखते हूए बोली - माँ, आप के दामाद जी की ड्रैस तो बहुत खूबसूरत है और दोनों मां-बेटी ठहाका मारकर हँसने लगी।
वास्तव में यदि हम अपने रिश्तो में सुंदरता लाना चाहते हैं तो हमें पहले अपने "मैं" यानि अहं को खत्म करना होगा। यदि हम प्यार चाहते हैं तो हमें प्यार बाँटना भी होगा, तभी रिश्तो की सुंदरता निखर कर सामने आएगी।
मधु धीमान

कैथल (हरियाणा)

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#Story# लौट आया आत्मविश्वास !

ईशा स्कूल से तेज कदमों के साथ वापस आई और दरवाजे में घुसते ही बैग एक तरफ फेंकते हुए ऊँचे स्वर में - माँ ……..माँ …...कहां हो ?
गीले हाथ पोंछती हुई माँ रसोई से बाहर आते हुए बोली - क्या बात है ऐसे क्यों शोर मचा रखा है ?
माँ, मैं कल स्कूल नहीं जाऊँगी …….रोते हुए वह बोली । क्या हुआ मैथ्स वाली मैडम से डाँट पड़ गई क्या - मां प्यार से दुलारते हुए बोली ।
ईशा माँ का हाथ झटकते हुए बोली - नहीं माँ, नहीं, बस मैं अब कभी स्कूल नहीं जाऊँगी , फिर औंधे मुंह बैड पर लेट गई ।
निशा नौवीं कक्षा की छात्रा थी । यूँ तो पढ़ने में खूब मेधावी थी ,पर किसी भी अतिरिक्त गतिविधि में भाग नहीं ले पाती थी । दरअसल वह कद - काठी में खूब लंबी थी , जिस कारण नाच - गाना आदि किसी प्रतियोगिता में उसकी हिस्सेदारी नहीं होती थी ।आज फिर एक बार ईशा माँ के सामने बैठ रोती ही जा रही थी ।
माँ ने उसे शांत होने के लिए कहा और बोली - ईशा रोना बंद करो और मुझे आराम से बैठ कर बताओ कि हुआ क्या है । ईशा ने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया और रोते हुए बोली - मां क्या मैं बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती हूँ , क्या मैं घोड़े जैसी चलती हूँ , मैं इतनी लंबी क्यों हूँ माँ ? - यह कहकर वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगी ।
माँ समझ गई थी कि स्कूल में कुछ तो हुआ है ।
बोलो , किसने क्या कह दिया तुमसे ? - मां ने दुखी स्वर में पूछा ।
माँ आज एन.सी .सी. के लिए जब छात्र-छात्राएँ चुने जा रहे थे तो मैडम मेरे खड़े होते ही बोली - तुम तो रहने ही दो ईशा । बिल्कुल घोड़े की तरह तो चलती हो तुम ।
मां को भी यह सुन बिल्कुल अच्छा नहीं लगा ।
पर वह ईशा को समझाते हुए बोली - बेटा ,नहीं …...तुम लंबी हो , यह तुम्हारा कोई अवगुण नहीं है बल्कि गुण है । देखो , अमिताभ - दीपिका सभी तो लंबे हैं, तो क्या उनकी कोई पहचान नहीं , तुम लंबी हो इसी कारण तुम्हारे कदम भी लंबे हैं और यही वजह है कि तुम दूसरे बच्चों से ज्यादा तेज चलती हो ।
अच्छा मां इसीलिए मैडम इसे घोड़े जैसी चाल बताती हैं……. वह अब कुछ शांत थी ।
तुम्हारी मैडम का बात कहने का अपना ढंग है परंतु वास्तविकता यह है कि लंबा होना तुम्हारा गुण है कोई दोष नहीं । यही कारण है कि तुम दूसरे बच्चों से तेज चलती हो । देखो , तुम दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेना । मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी बेटी दौड़ प्रतियोगिता में अवश्य ही जीतेगी और जीतेगी भी क्यों नहीं महाराणा प्रताप के चेतक से तेज दौड़ती है मेरी बेटी ।
यह सुनते ही ईशा का खोया आत्मविश्वास लौट आया और वह मुस्कुरा दी ।  इस छोटी सी कहानी के माध्यम से मैं सभी से यह निवेदन करना चाहती हूँ कि कभी भी किसी की शारीरिक बनावट को लेकर उसका अपमान ना करें । यह रूप- रंग - काया सब भगवान की देन है। किसी व्यक्ति की चाल - ढाल उसकी शारीरिक बनावट पर ही निर्भर करती है , इसलिए हर व्यक्ति को प्रभु की सर्वोत्तम कृति समझकर सम्मान दें ।
 धन्यवाद
मधु धीमान

कैथल - हरियाणा

Saturday, August 31, 2019

हमता ( अहंकार )

जिंदगी की इस मीठी - मीठी धुन पर मैं गुनगुना रही थी
 खुशियां अपार पाकर मैं स्वयं पर इतरा रही थी ।
परवाह नहीं थी कि कोई है मेरे साथ या नहीं
 बस भाग्य का साथ पाकर मुस्कुरा रही थी ।
कौन इधर - कौन उधर , बिन देखे बिन सोचे 
ऊंचाइयों को छूने आगे ही आगे बढ़ती जा रही थी ।
उन्नति के इस खूबसूरत गतिशील सफर में 
प्रतिभा भी लगातार साथ मेरा निभाए जा रही थी ।
मिलते रहें पारितोषिक, मान - सम्मान बारम्बार 
 तृष्णा यह मेरी लगातार बढ़ती ही जा रही थी ।
प्रसिद्धि की इस लम्बी राह में पता ही ना चला 
चुपके -चुपके हमता भी दामन मेरा थामे जा रही थी ।
आत्मनुभूति तो हुई बार-बार लालची मन को
पर बन चतुर यूँही नजरअंदाज किए जा रही थी ।
ना ही डरी और न ही संभली , हर पल बस  
चाहत की इस दौड़ में चलती ही जा रही थी । 
अनभिज्ञता से फिर मंजर कुछ ऐसा बना कि
सफलता असफलता का रूप लिए जा रही थी ।
वाहवाही और सलामियों  के युग को याद कर
 मन ही मन बस अकेली रोती ही जा रही थी । 
काश हमता न होती , थोड़ा ही  बहुत लगता 
यह सोच - सोच हाथ मलती  ही जा रही थी ।
 अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत
 यही दोहा बार -बार  दोहराए जा रही थी ।
अहंकार न आए पास ,अपनों से हैं खुशियाँ
यह सबक स्वयं को ही सिखाए जा रही थी ।

                                                  
                                                    मधु धीमान