हमता ( अहंकार )
जिंदगी की इस मीठी - मीठी धुन पर मैं गुनगुना रही थी
खुशियां अपार पाकर मैं स्वयं पर इतरा रही थी ।
परवाह नहीं थी कि कोई है मेरे साथ या नहीं
बस भाग्य का साथ पाकर मुस्कुरा रही थी ।
कौन इधर - कौन उधर , बिन देखे बिन सोचे
ऊंचाइयों को छूने आगे ही आगे बढ़ती जा रही थी ।
उन्नति के इस खूबसूरत गतिशील सफर में
प्रतिभा भी लगातार साथ मेरा निभाए जा रही थी ।
मिलते रहें पारितोषिक, मान - सम्मान बारम्बार
तृष्णा यह मेरी लगातार बढ़ती ही जा रही थी ।
प्रसिद्धि की इस लम्बी राह में पता ही ना चला
चुपके -चुपके हमता भी दामन मेरा थामे जा रही थी ।
आत्मनुभूति तो हुई बार-बार लालची मन को
पर बन चतुर यूँही नजरअंदाज किए जा रही थी ।
ना ही डरी और न ही संभली , हर पल बस
चाहत की इस दौड़ में चलती ही जा रही थी ।
अनभिज्ञता से फिर मंजर कुछ ऐसा बना कि
सफलता असफलता का रूप लिए जा रही थी ।
वाहवाही और सलामियों के युग को याद कर
मन ही मन बस अकेली रोती ही जा रही थी ।
काश हमता न होती , थोड़ा ही बहुत लगता
यह सोच - सोच हाथ मलती ही जा रही थी ।
अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत
यही दोहा बार -बार दोहराए जा रही थी ।
अहंकार न आए पास ,अपनों से हैं खुशियाँ
यह सबक स्वयं को ही सिखाए जा रही थी ।
मधु धीमान
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