Thursday, November 21, 2019

#Story; मेरी ख्वाहिशें अभी जिंदा है !

नितिका को बचपन से ही ड्राइंग करने का बहुत शौक रहा है | बड़े होते - होते यह ड्राइंग खूबसूरत पेंटिंग में बदल गई | नीतिका ने एक से बढ़कर एक खूबसूरत पेंटिंग बनाई | कोई भी वह अद्भुत कलाकारी देखता तो तारीफ किए बिना नहीं रह पाता |  शादी के बाद भी नितिका ने अपना यह शौक बरकरार रखा | ससुराल में सभी लोग उसकी इस कला के दीवाने हो गए थे| उसने अनेकों खूबसूरत पेंटिंग्स बनाई और अपने सभी प्रिय रिश्तेदारों को उपहार स्वरूप सप्रेम भेंट की | जब भी कोई उसकी बनाई किसी कृति की तारीफ़ करता तो और उम्दा कृति बनाने के लिए उसका उत्साह बढ़ जाता और वह अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाने का सपना देखने लगती।  अब नितिका दो बच्चों की माँ बन चुकी थी । बड़ी बिटिया दसवीं कक्षा में थी। इस ज़िम्मेदारी भरी जीवन यात्रा में उसका चित्र बनाने का यह शौक दूसरे - तीसरे पायदान पर पहुँच गया था ।
एक दिन यूँहि उसके पतिदेव पूछ बैठे - नितिका , तुमने काफी समय से कोई पेंटिंग नहीं बनाई ।
सुनते ही उसने नज़र उठाई और बोली हां …...जैसे (वह तो भूल ही गई थी कि कभी पेंटिंग बनाना उसका सबसे पहला शौक था )
मैं कल एक चित्र प्रदर्शनी में गया था - पतिदेव बोले ।
मुझे क्यों नहीं ले कर गए - वह काम करते-करते उत्सुकता वश अपने दोनों हाथ खाली करते हुए बोली ।  अभी तो प्रदर्शनी 1 सप्ताह के लिए है । हम एक बार फिर चलेंगे - वह नीतिका की उत्सुकता देख उसे दिलासा देते हुए बोले ।
रात भर नितिका सोचती रही- काफी समय से उसने कोई नई पेंटिंग क्यों नहीं बनाई, वह अब जरूर नई कृति बनाएगी । अगर वह लगातार नई पेंटिंग्स बनाती रहती तो शायद उसका चित्र प्रदर्शनी लगाने का सपना पूरा हो जाता । अगले दिन जैसे ही वे दोनों चित्र प्रदर्शनी पहुँचे तो वहाँ एक से बढ़कर एक कृति देख नितिका की तो आँखें चुँधिया गई । उसका बेजान हुआ उत्साह फिर से जाग गया । पतिदेव के एक मित्र भी यही शौक रखते थे , वे भी प्रदर्शनी देखने पहुँचे हुए थे । जैसे ही उनका आमना-सामना हुआ
तो पतिदेव नीतिका की तारीफ़ में बोल पड़े - यार , नितिका भी बहुत सुंदर पेंटिंग्स बनाती है ,अभी एक नई पेंटिंग शुरू करने की सोच रही है, यह भी चित्र प्रदर्शनी लगाना चाहती है ।
इस पर वह महाशय पतिदेव की बात बीच में ही काटते हुए बोले - भाभी जी ,अब तो बच्चे बड़े हो गए हैं । हमें अपने शौकों की न सोचते हुए बच्चों की रुचियों की ओर ध्यान देना चाहिए । हमारा समय तो अब निकल गया । अब तो बच्चों की इच्छाओं को रास्ता देना है । अपनी तरफ से वह समझदारी भरी बातें कर रहे थे , परंतु नीतिका को उनकी बात सही नहीं लगी और वह बीच में ही बोल पड़ी - भाई साहब, बच्चों का अपना जीवन है ,और हमारा अपना ।
हमारा जीवन अभी बाकी है। हमें बच्चों के शौक पूरे करने में सहयोगी बनना है ना कि अपनी सभी ख्वाहिशें त्याग कर उनका साथ देना है। मैं तो जीवन के अंतिम क्षण तक सीखने की इच्छा रखती हूँ और सीखती भी रहूँगी । जल्द ही आप मेरी भी चित्र प्रदर्शनी देखने आएँगे ।
 यह सुनते ही मित्र महाशय के मुँह पर तो जैसे ताला ही लग गया ।
नीतिका ने पतिदेव का हाथ पकड़कर कहा - चलें क्या, पेंटिंग का सामान भी तो खरीदना है ।
पति देव नितिका के आत्मविश्वास को देख मंद - मंद मुस्कुरा रहे थे । जब तक हम अपने पंख फैलाए रखेंगे , कोई हमारा उड़ना बंद नहीं करवा सकता । मधु धीमान

कैथल (हरियाणा)

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