Thursday, November 21, 2019

आज की आवश्यकता: संस्कार

जिस प्रकार एक कुम्हार मिट्टी को कोई भी रूप दे सकता है , ठीक उसी प्रकार हम भी बच्चों को किसी भी रूप में
ढाल सकते हैं बशर्ते हमें और आज के बच्चों को नियम बद्धत्ता की आवश्यकता है । केवल मनुष्य ऐसा प्राणी है जिसके भीतर रावण बनने की भी संभावना है और राम बनने के अवसर भी । मनुष्य में यदि डाकू बनने की संभावना है तो उसके भीतर महात्मा बुद्ध बनने का अवसर भी है परंतु यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज हमें जगह-जगह इंसानियत को आतंकित करने वाले रावण या डाकू तो मिल जाएँगे परंतु राम , कृष्ण और बुद्ध कहीं नजर नहीं आते । जिस प्रकार इत्र की खुशबू चारों और बिखर जाती है और हर वस्तु को सुगंधित कर देती है ठीक उसी प्रकार हमें आज के बालक के लिए भी ऐसी संभावनाएँ तय करनी है कि वह सुगंधित फूल की तरह खिल सके । उसे संस्कारवान बनाने के लिए कुछ मुख्य बिंदु अहम भूमिका निभाते हैं जैसे - 1 वातावरण का प्रभाव - वातावरण एक बालक को अत्यधिक प्रभावित करता है । बालक के चारों तरफ सहजता , सकारात्मकता , सहयोग और उत्थान के पथ होना आवश्यक है । ध्यान रहे कि प्रत्येक बालक में अद्भुत व विलक्षण क्षमता है यदि हम उस अद्भुत - विलक्षण क्षमता को विशिष्टता में बदलना चाहते हैं तो बालक के चारों ओर सकारात्मकता बनाए रखें । 2 संयुक्त परिवार : एक आवश्यकता - आज बालक के संस्कार - आदर्श कहीं लुप्त होते दिख रहे हैं । दुनिया में दूसरे नंबर की आबादी रखते हुए भी आज प्रत्येक व्यक्ति अकेला है । कुछ इस तरह का माहौल है कि केवल दो भाई बहन होने पर भी वे अकेले हैं क्योंकि सब अपने में व्यस्त हैं । परिवार टूटते जा रहे हैं । ऐसे में यदि संयुक्त परिवार बने रहें तो बालक अपने बड़ों - छोटो से जाने - अनजाने में संस्कार लेता रहता है । यदि समाज में बालक से योगदान की आशा है तो पहले उसे परिवार में योगदान करना सिखाने की आवश्यकता है । 3 समाज की दौड़ को सही दिशा - आज मनुष्य वैभव व अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की अंधी दौड़ में शामिल है । वह अपने मूल उद्देश्य को भूल गया है । आज बालक भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करके, दिखावा करके स्वयं को प्रसन्न महसूस करता है परंतु यदि मौलिक प्रसन्नता की कामना है तो बच्चों को वास्तविक जीवन जीना सिखाने की आवश्यकता है । 4 शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता - शिक्षा प्रणाली में भी अनुशासनहीनता दिखाई देने लगी है क्योंकि बालक को कुछ नहीं कहना -इस आड़ में संस्कारों का दहन और अनुशासनहीनता का जन्म हो रहा है । बालक को सही मार्ग - दिशा देना माता -पिता , गुरु का प्रथम कर्तव्य है। नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए बालक के उद्दंड स्वभाव पर रोक लगाना आवश्यक है । भावनाशील होकर संस्कृति के आधारभूत तत्वों को बालपन से ही बच्चों के व्यक्तित्व का अंग बनाने की आवश्यकता है । 5 तकनीकी का सकारात्मक रूप - तकनीकी के दिन - प्रतिदिन के विकास को देखते हुए हम विज्ञान के सामने नतमस्तक हैं और जहाँ एक ओर विज्ञान खुशहाली प्रदान करता है वहीं दूसरी ओर आतंकवाद का साधन भी है । जहाँ एक ओर वह घर आबाद कर सकता है वही दूसरी ओर युद्ध का तांडव भी इसका उदाहरण है, इसलिए बच्चों को तकनीकी के केवल सकारात्मक रूप से अवगत कराने की आवश्यकता है । ये बच्चे ही हमारी , समाज की व देश की वास्तविक संपत्ति है । इन बच्चों को संस्कारवान बनाना हमारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए । अपने व्यस्त जीवन में से कुछ लम्हें बच्चों के साथ बिताने की आवश्यकता है । यदि हम बच्चे का ,अपना ,समाज का व देश का भविष्य उज्जवल व सुरक्षित चाहते हैं तो हमें बच्चे के आज को कुछ समय देना पड़ेगा । तभी हम किसी राम ,कृष्ण या महात्मा बुद्ध की कल्पना कर सकेंगे । मधु धीमान

कैथल (हरियाणा)

No comments:

Post a Comment